Saturday, April 4, 2009

समस्याओं की जड़ तक पहुँचना ज़रूरी


"चीजें हमेशा वैसी नहीं होतीं जैसी वे दिखती हैं।'
प्रत्येक संगठन के सामने अपनी तरह की खास समस्याएं होती हैं जिनसे उनके कारोबारी संचालन पर असर पड़ने के साथ ही उनके लाभ में कमी लाती हैं और जिनके कारण ग्राहकों के असंतोष से भी संगठन को दो-चार होना पड़ता है। अधिकांश व्यावसायिक संगठनों की कोशिश यह होती है कि इन समस्याओं का त्वरित व तात्कालिक समाधान ढूंढा जाए। इस कोशिश में वे समस्या के मूल कारणतक नहीं पहुंच पाते हैं। स्वाभाविक है कि ऐसे संगठनों के सामने समस्याएं बार-बार खड़ी होती रहती हैं। पिछले कुछ वर्षों में कई ऐसे गुणवत्ता नियंत्रण (क्वालिटी कंट्रोल/क्यूए) एवं कारोबारी विकास कार्यक्रम सामने आए हैं जो समस्याओं के मूल कारण को पहचानने पर केन्द्रित हैं। इनके तहत अधिक ध्यान इस बात पर दिया जाता है कि संगठन के काम-काज के दौरान उत्पन्न होने वाली कमियों और गलतियों को न्यूनतम स्तर पर लाया जाए। इसके लिए स्वाभाविक तौर पर ऋुटिविहीन प्रक्रियाओं को अपनाकर बेहतरीन प्रदर्शन करने पर जोर दिया जाता है। ऐसे कार्यक्रमों में जीरो डिफेक्ट्‌स, क्वालिटी सर्कल्स, सिक्स सिग्मा और टीक्यूएम जैसे कार्यक्रमों को गिना जा सकता है जो व्यावसायिक संगठनों में काफी लोकप्रिय हो चुके हैं। इन सभी कार्यक्रमों का मूल सिद्धांत काफी मिलता-जुलता है। इसे यूं समझा जा सकता है कि "प्रत्येक काम पहली ही बार बिल्कुल सटीक ढंग से किया जाए।' इस औजार को कई संगठनों ने व्यापार संचालन एवं उत्पादन संबंधी सभी समस्याओं के समाधान के लिए अपनाया है। अगर अपने उत्पाद में कोई व्यापारी किसी प्रकार का मूल्य संवर्द्धन नहीं भी करता है तो भी यह सिद्धांत उसके लिए काफी कारगर हो सकता है।
इस तकनीक के साथ ही समस्याओं के मूल कारण का विश्लेषण (रूट कॉज एनालिसिस) भी समस्याओं से निपटने में कारगर साबित हो सकता है। इससे विभिन्न संगठनों को अपने कार्य संचालन की राह में आने वाली बाधाएं दूर करने और प्रक्रियात्मक बेहतरी में मदद मिलती है। साथ ही उन क्षेत्रों की पहचान भी की जा सकती है जिनमें संचालनात्मक या प्रक्रियात्मक संशोधन से सर्वाधिक लाभ मिल सके। रूट कॉज एनालिसिस उन कारणों को जड़ से समाप्त करने में मदद देता है जिनके चलते समस्याएं बार-बार उभरकर सामने आती हैं। यह तभी संभव है जब किसी समस्या का मूल कारण समझ लिया जाए। इस सिद्धांत के नाम से ही स्पष्ट है कि मूल कारण को समझ कर ही समस्या को पूरी तरह से समझा और उसका निपटारा किया जा सकता है।
वास्तव में रूट-कॉज एनालिसिस की प्रक्रिया किसी भी समस्या के बारे में पूंछे जाने वाले तीन मुख्य प्रश्नों के उत्तर ढूंढती है कि समस्या क्या है, यह कैसे उत्पन्न हुई और क्यों उत्पन्न हुई। यह समस्याओं के समाधान का सबसे प्रभावी तरीका है क्योंकि इसके तहत अपनाई जानेवाली समाधान प्रक्रिया किसी भी प्रकार की समस्या के निपटारे का सबसे आसान और स्वाभाविक प्रक्रिया है। अगर समस्या का विश्लेषण प्रभावी ढंग से किया जा सके तो इससे उच् च गुणवत्तायुक्त प्रक्रियात्मक बेहतरी का औजार भी हाथ लग सकती है। इसकी मुख्य विशेषता यह है कि इससे समस्या उत्पन्न होने का मूल कारण समझा जा सकता है। इससे संगठन के उन लोगों को आसानी होती है जो समस्या निपटाने की जिम्मेदारी निभाते हैं। उन्हें यह समझ में आता है कि कोई प्रक्रिया क्यों असफल हो गई और इस प्रकार की असफलता से निपटने के लिए क्या उपाय कारगर रहेंगे ताकि भविष्य में ऐसी समस्याओं से बचा जा सके।
इस तरह, संगठनों को समस्याओं का प्रभावी निपटारा सुनिश्चित करना हो तो समस्याओं के मूल कारणों के विश्लेषण करने के साथ ही उन कारणों का दूर करना होता है। इसके लिए उन्हें निम्नलिखित चार चरणों से होकर गुजरना पड़ता है जो इस प्रकार हैं
1.समस्या से संबंधित सभी आंकड़े जुटाना
2. आंकड़ों का विश्लेषण करना
3. मूल कारण की पहचान करना और
4. समस्या को हल करने का तरीका तलाशकर उसे क्रियान्वित करना।
अक्सर हम किसी समस्या के आभासी कारण को ही उसका मूल कारण मान लेते हैं। समस्याओं के आभासी कारण वस्तुत: समस्या के स्पष्ट या तात्कालिक कारण होते हैं। कई बार ऐसा होता है कि आभासी कारण को ही हम समस्या का मूल कारण मान लेते हैं जबकि समस्या की जड़ कहीं और छिपी होती है।
कारोबारी संदर्भ में समस्याओं के मूल कारणों के विश्लेषण को "व्यावसायिक संचालन तथा प्रक्रिया में खामी वाले क्षेत्रों की पहचान' के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। प्रायोगिक नजरियों से भी देखें तो यह एक ऐसा औजार है जो हमारे आम जीवन में विभिन्न लोगों या परिस्थितियों को समझने में काफी मदद देता है।

बलारी में जद-एस का प्रत्याशी नहीं

कार्यालय संवाददाता
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बेंगलूर। राज्य में लोकसभा चुनावों के अंतर्गत जनता दल (एस) बल्लारी संसदीय क्षेत्र में अपना प्रत्याशी नहीं उतारेगा। दल को लगता है कि बल्लारी में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की आर्थिक सुदृढ़ता का उसका प्रत्याशी मुकाबला नहीं कर सकता है, इसलिए दल ने यह फैसला किया है। यह जानकारी शुक्रवार को जद (एस) के प्रदेशाध्यक्ष एचडी कुमारस्वामी ने दी।
यहां पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहां कि बल्लारी जिले का वातावरण विपक्षी दलों के लिए ठीक नहीं है। वहां संविधान के अनुसार मतदाताओं को चुनाव के प्रेरित करने का प्रयास नहीं किया जाता और वहां का माहौल अलोकतांत्रिक पद्धति जैसा हो गया है। बल्लारी जिले के भाजपा नेताओं पर अपने प्रत्याशी की जीत के लिए अपनी सत्ता और धन का बेजा इस्तेमाल करने का आरोप लगाते हुए पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि जद (एस) ने फैसला किया है कि बल्लारी में दल को कोई प्रत्याशी चुनाव नहीं लड़ेगा। चुनाव आयोग के आंकड़ों का हवाला देते हुए कुमारस्वामी ने कहा कि चुनाव आचार संहिता उल्लंघन के मामले में बल्लारी क्षेत्र सबसे ऊपर है। वहां राज्य के अन्य क्षेत्रों के साथ अन्य राज्यों के मुकाबले भी आचार संहिता का उल्लंघन, अवैध शराब, धन, सामग्री की बरामगदी और चुनाव संबंधी हिंसा की वारदातों में बेतहाशा वृद्धि हुई है.
बल्लारी जिले के खदान क्षेत्रों का दौरा किए जाने के बारे में पूछे जाने पर कुमारस्वामी ने कहा कि वह सिर्फ इस बात की सच्चाई पता लगाने वहां गए थे कि बल्लारी में भाजपा नेताओं द्वारा एक बहुत बड़े स्तर पर अवैध खनन गतिविधियों को अंजाम दिया जा रहा है। इन अवैध गतिविधियों को रोकने के लिए चुनाव आयोग से हस्तक्षेप की मांग करते हुए कुमारस्वामी ने कहा कि चुनाव के दौरान इस अवैध खनन की साजिश को सफल होने से रोका जा सकता है। उन्होंने दावा किया कि अवैध खनन गतिविधियों से प्राप्त राशि का उपयोग ही चुनाव में किया जा रहा है।
बेंगलूर दक्षिण क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी अनंतकुमार द्वारा शुरू की गई रंग यात्रा पर कड़ी आपत्ति उठाते हुए उन्होंने कहा कि इसमें भगवान गणेश की प्रतिमा का उपयोग करना चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन है। इस संबंध में वह दल की तरफ से जल्द ही एक शिकायत भाजपा प्रत्याशी के विरुद्ध आयोग से करेंगे।

Wednesday, April 1, 2009

बेंगलूर का सेकंड हैंड कार बाजार टाटा "नैनो' से आशंकित


बेंगलूूर। अपने वादे के अनुरूप भारत की सबसे बड़ी वाहन निर्माता कंपनी टाटा मोटर्स ने भले ही दुनिया की सबसे सस्ती लखटकिया कार "नैनो' भारतीय बाजार में उपलब्ध करवा दी है लेकिन इस कार के बारे में शहर में कोई खास चर्चा सुनने को नहीं मिल रही है। यहां के कार प्रेमियों की जमात सिर्फ कीमत के आधार पर किसी कार के बारे में अपना मत बनाने को तैयार नहीं हैं। यहां की सड़कों पर अन्तरराष्ट्रीय रूप से मशहूर तथा करोड़ों रुपयों की कीमत वाली विलासितापूर्ण कार मॉडलों को इठलाते हुए चलते देखा जाता है। इस बाजार में सिर्फ सस्ता होना किसी कार का आकर्षण नहीं माना जाता है। बहरहाल, बेंगलूर में एक विशेष कार बाजार नैनो लांच होने के बाद लगातार चिन्ताएं जता रहा है। यह सेकंड हैंड कारों का बाजार है। इस बाजार को टाटा की सस्ती कार से अपने धंधे में प्रतियोगिता बढ़ जाने की आशंका दिखने लगी है। नैनो को बाजार में लांच करने के लिए जो समय चुना गया है उससे सेकंड हैंड कार बाजार की चिन्ताएं अधिक बढ़ गई हैं।
कुछ सेकंड हैंड कार डीलरों का कहना है कि एक तो इस समय वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण बेंगलूर के कार प्रेमी भी नई-पुरानी कारों से अपनी दूरी बनाए हुए हैं, दूसरे नैनो के बाजार में आने से उनके लिए मामला अधिक गंभीर हो जाएगा। पहले बेंगलूर में सेकंड हैंड कारों की मांग भी इतनी अधिक होती थी कि इस बाजार में आने वाले सेकंड हैंड कारों के नए स्टॉक भी दो या तीन दिनों में बिक जाते थे। अब अगर नैनो के रूप में टाटा ब्रांड की चमचमाती नई कार लोगों को मिलने लगती है तो पुरानी कारों की तरफ कौन रुख करेगा?
इस आशंका के मद्देनजर कई सेकंड हैंड कार डीलर अपने स्टॉक को आनन-फानन में समाप्त करने की कोशिशों में जुट गए हैं। हालांकि नैनो कार की बिक्री औपचारिक रूप से शुरू कर दी गई है लेकिन सड़कों पर यह कार दिखने में अभी कुछ समय और लगेगा। इस समय का सदुपयोग करने के लिए कई डीलर अपने संभावित ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए कई विशेष पेशकश भी कर रहे हैं। इनमें खास रियायती कीमतों के साथ ही बिक्री के बाद सर्विसिंग की सुविधा तथा रियायती मूल्य पर कारों के पुर्जे उपलब्ध करवाने की पेशकश भी शामिल है। इनकी वजह से डीलरों के फायदे का आंकड़ा काफी कम हो गया है। उन्हें पुरानी कारों पर अधिक-से-अधिक 3 फीसदी का लाभ मिल पा रहा है। पहले लगभग 15 फीसदी के लाभ पर कारों की बिकवाली करने वाले डीलरों के लिए यह बड़ी समस्या है। इस स्थिति के लिए वे नैनो की लांचिंग को ही मुख्य कारण मानते हैं।
इस बारे में मिली एक दिलचस्प जानकारी के मुताबिक, इन दिनों बेंगलूर के सेकंड हैंड कार बाजार में पुरानी कारों की नीलामी का दौर अधिक चल रहा है। इसके लिए वैश्विक मंदी की चपेट में आए कार मालिकों की नौकरी छूटना या वेतन में कटौती मुख्य वजह माने जा रहे हैं। जिन कार मालिकों ने विभिन्न वित्तीय संस्थाओं से ऋण लेकर कार खरीदे थे, वे ब्याज या ईएमआई न दे पाने की स्थिति में अपनी कार जब्त करवा देने में ही अपनी भलाई मान रहे हैं। इस कारण से जब्त की गई कारों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इन्हें सेकंड हैंड कार बाजार में लाकर नीलाम किया जा रहा है। इससे पुरानी कारों के बाजार पर नया दबाव भी बन रहा है।

मारुति के माथे पर भी पड़ा बल
कार बाजार के जानकारों का कहना है कि नैनो कार को बाजार में लांच किए जाने का असर सिर्फ सेकंड हैंड ही नहीं बल्कि मारुति 800 जैसी कारों पर भी पड़ने वाला है। यह बात मारुति उद्योग लिमिटेड के आधिकारिक सूत्र भी मानने लगे हैं। हाल में नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मारुति उद्योग लिमिटेड के एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्वीकार कर लिया कि भारत में कारों से होने वाले उत्सर्जन के नियमन के लिए "भारत स्टेज-3' (बीएस-3) मानदंडों को लागू किए जाने के बाद कंपनी को मारुति 800 में कई तकनीकी सुधार करने होंगे। इस सुधार के बाद मारुति 800 के पारंपरिक बाजार के लिए इस श्रृंखला की कारों की कीमतें आकर्षक नहीं रह जाएंगी। लोग महंगी मारुति खरीदने की बजाय टाटा की नैनो कार खरीदना अधिक पसंद करेंगे।

डीटीएच ऑपरेटर बीमा की बात करे तो चौंकने की जरूरत नहीं


बेंगलूर। डायरेक्ट टू होम (डीटीएच) टेलीविजन सेवा प्रदाता कंपनियों के कर्मचारियों को अब जल्दी ही एक नई भूमिका में देखा जाएगा। यह कर्मचारी अपनी कंपनी के ग्राहकों को बीमा योजनाएं भी बेचेंगे। यानी, अगर आपका केबल टीवी कंपनी का कर्मचारी आपकी टीवी सुधारने के लिए आए और आपको बीमा योजनाओं के बारे में भी बताने लगे तो हैरत में पड़ने की कोई जरूरत नहीं है।
जानकारी के मुताबिक, हाल के कुछ वर्षों में भारत के अधिकांश बैंकों ने अपनी अलग बीमा कंपनियां शुरू कर दी हैं। पहले यह बैंक बीमा कंपनियों के उत्पादों की बिक्री में खास भूमिका निभाया करते थे। बैंकों से पहले की तरह सहयोग नहीं मिलने के कारण बीमा कंपनियों ने अब ग्राहकों तक पहुंचने के लिए वैकल्पिक मार्गों की तलाश तेज कर दी है। इस सिलसिले में कुछ कंपनियों ने केबल ऑपरेटरों के ग्राहक वर्ग में अपनी पहुंच बनाने की कोशिश शुरू की है। निजी क्षेत्र की बीमा कंपनियों भारती एएक्सए तथा रिलायन्स लाइफ इन्श्योरेन्स कंपनियों ने अपनी डीटीएच इकाइयों के माध्यम से अपने बीमा उत्पादों की बिक्री की रणनीति बनाई है ताकि उन्हें एक पहले से बना-बनाया बाजार मिल जाए। इसी सोच के तहत भारती तथा रिलायन्स ने अपने मोबाइल फोन ग्राहकों को भी अपने बीमा उत्पादों के बारे में जानकारी देने की शुरुआत की थी। यह रणनीति काफी हद तक कामयाब भी बताई गई। इस कामयाबी के बाद अब दोनों कंपनियों ने डीटीएच ग्राहकों को अपने निशाने पर रखा है। यह वर्ग समाज के उच्चतर तबके का होने के कारण इसके पास काफी अतिरिक्त तरलता होती है जिसका निवेश करने के लिए बीमा योजनाएं एक बेहतर विकल्प हो सकती हैं।
उल्लेखनीय है कि इस समय जहां भारती एएक्सए अपने बीमा उत्पादों की बिक्री अपनी मोबाइल फोन भुजाएं एयरटेल तथा भारती टेलीटेक के माध्यम से कर रही है वहीं रिलायन्स लाइफ इन्श्योरेन्स कंपनी ने अपनी डीटीएच सेवा प्रदाता कंपनी बिग टीवी के माध्यम से अपनी बीमा योजनाओं की बिक्री करने की रणनीति अपनाई है। भारती एएक्सए के सूत्रों पर भरोसा करें तो बेंगलूर के ग्राहकों ने इसकी नई रणनीति को काफी पसंद किया है। शहर में स्थित इसके ग्राहक संबंध केन्द्रों पर प्रत्येक दिन बड़ी संख्या में बीमा उत्पादों के बारे में पूछताछ करने वाले लोग आते रहते हैं।

बुद्धिमतापूर्ण संवेदनशीलता का महत्व


बेंगलूर। बुद्धिमत्तापूर्ण संवेदनशीलता या संवेदनशीलता अनुपात (इमोशनल कोशिएंट/ईक्यू) हाल के वर्षों में व्यावसायिक सफलता का एक बड़ा कारक बन गया है। यह अवधारणा व्यवसाय प्रबंधकों की इस क्षमता को तौलने के लिए विकसित की गई है कि वे अपनी संवेदनाओं को कितना समझ पाते हैं तथा अपने साथ काम करने वालों की भावनाओं का ख्याल रखने में वे कितने सफल होते हैं। व्यावसायिक सफलता प्रबंधकों की इस क्षमता पर काफी हर तक निर्भर करती है। शोधकार्यों से पता चला है कि बुद्धिमत्तापूर्ण संवेदनशीलता लोगों के निजी और पेशेवर जीवन में 80 फीसदी सफलता दिला सकती है।
जहॉं बुद्धिमत्ता अनुपात (आईक्यू) का संबंध दिमाग से होता है वहीं ईक्यू का संबंध दिल होता है। इसका यह अर्थ नहीं कि यहॉं दिमाग पर दिल की जीत की बात की जा रही है बल्कि इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि अपने आस-पास के लोगों के साथ सहानुभूति रखना और उनके दिल जीतना पेशेवर जीवन में सफल होने के लिए भी जरूरी है। लोगों के दिलों पर जगह बनाकर ही उनके दिमागों तक पहुंचा जा सकता है। एक वैज्ञानिक अध्ययन में पाया गया है कि भावनात्मक जागरूकता और संवेदनाओं का बेहतर प्रयोग करने की क्षमता से जीवन में खुशियां और सफलताएं हासिल की जा सकती हैं।
बुद्धिमत्तापूर्ण संवेदनशीलता (ईआई) को साधारण शब्दों में इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है, "निजी भावनाआएं के साथ ही दूसरों की या किसी समूह की भावनाओं को समझने, उनका आंकलन और प्रबंधन करने तथा जीवन या व्यवसाय से जुड़ी मांग व दबाव से निपटने की योग्यता और क्षमता को बुद्धिमत्तापूर्ण संवेदनशीलता कहा जाता है।' ईआई को एक व्यापक स्वरूप में देखने के लिए किसी व्यक्ति में एक समूह के विभिन्न लोगों के साथ बेहतर संबंध विकसित करने की क्षमता सबसे महत्त्वपूर्ण कारक होता है। मशहूर मनोवैज्ञानिक डैनियल गोलमैन के मुताबिक, बुद्धिमत्तापूर्ण संवेदनशीलता के चार प्रमुख कारक इस प्रकार हैंः
* आत्म जागरूकता ः कोई निर्णय लेते समय निजी भावनओं को समझने और महत्त्वपूर्ण निर्णयों पर उनके प्रभाव का आंकलन करने की क्षमता।
* आत्म प्रबंधन ः किसी निर्णय का दिशा-निर्देशन करते समय निजी भावनाओं पर नियंत्रण पाने और परिस्थितियों के साथ ढलने की क्षमता।
* सामाजिक जागरूकता ः दूसरों की भावनाओं को समझकर प्रतिक्रिया व्यक्त करने और सामाजिक ताने-बाने को समझने की क्षमता।
* संबंधों का प्रबंधन ः आपसी टकराव का प्रबंधन करते हुए दूसरों को प्रेरित, प्रभावित और विकसित करने की क्षमता।
नेतृत्वशक्ति की मुख्य दक्षताओं में बुद्धिमत्तापूर्ण संवेदनशीलता को पहले स्थान पर रखा जा सकता है। किसी भी क्षेत्र का नेतृत्व करने वालों में यह क्षमता होनी ही चाहिए कि वे अपने साथ या आस-पास के लोगों को प्रेरित व प्रोत्साहित कर सकें। यदि वे अपनी भावनाओं के बारे में ही जागरूक नहीं होंगे, अपने साथ के लोगों या आस-पास के वातावरण को नहीं समझ पाएंगे तो कहा जाएगा कि उनका संवेदनशीलता अनुपात (ईक्यू) कम है। इस हालत में वे न तो दूसरों को प्रेरित नहीं कर सकते हैंऔर न ही समाज का नेतृत्व। आधुनिक औद्योगिक इकाइयों में ऐसे कार्यक्षेत्र विकसित किए जाते हैं, जिनमें कर्मचारियों के बीच मुक्त विचार-विमर्श और ज्ञान का आदान-प्रदान हो सके, लोगों को एक समूह के रूप में काम करने की प्रेरणा मिल सके और कर्मचारियों तथा उनके वरिष्ठ अधिकारियों के बीच द्विपक्षीय सम्मान का भाव विकसित हो सके। इन हालात में बेहतर ईआई वाले प्रबंधक अपनी टीम को बेहतर समझ सकते हैं और टीम के प्रत्येक सदस्य की अपनी-अपनी क्षमताओं का पूरा प्रयोग भी कर सकते हैं।
इस विषय में फेडरेशन ऑफ कर्नाटक चेंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (एफकेसीसीआई) के उपाध्यक्ष एनएस श्रीनिवासमूर्ति कहते हैं, "विभिन्न औद्योगिक इकाइयों में ईआई का बेहतर प्रयोग एक स्वागत योग्य कदम है। इससे प्रबंधन विज्ञान के विभिन्न आयामों को बेहतर रूप से समझना और उपयोग में लाना आसान हो जाता है। इसके लिए ईक्यू का आंकलन करने की विस्तृत प्रक्रिया को जानना-समझना महत्त्वपूर्ण कदम है। यह जानना भी जरूरी है कि कोई व्यक्ति किस तरह से अपना ईक्यू बढ़ा सकता है।'
कॉर्पोरेट घरानों द्वारा अपने शीर्ष प्रबंधकों की ईआई या ईक्यू में बेहतरी करने के लिए की गई पहल के अच्छे नतीजे आए हैं। इनसे जहां उनकी उत्पादकता में अभिवृद्धि हुई है वहीं उनका नजरिया पहले से अधिक सकारात्मक भी हुआ है। कंपनियों के उत्पाद तथा सेवाओं की बिक्री बढ़ाने, कर्मचारियों को प्रसन्न रखने तथा ग्राहकों को संतोष देने में भी ईआई से संबंधित पहल काफी कारगर रहे हैं। आज वैश्विक मंदी के इस दौर में भी इस प्रकार के पहल संदर्भहीन नहीं हुए हैं। प्रो. चंद्रकला वी कहती हैं, "बुद्धिमत्तापूर्ण संवेदनशीलता का महत्व आने वाले समय में लगातार बढ़ता जाएगा तथा भविष्य में यह आज से अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाने लगेगा। युवा पेशेवर कामगारों के लिए यह जरूरी है कि वे अपने शैक्षणिक दिनों से ही इस संबंध में खुद को जागरूक बनाना शुरू कर दें। इससे वे किसी भी हालत में खुद को ढालने में सक्षम हो जाते हैं।'

"मैजेस्टिक" बस स्टैंड के सुधार का काम 9 से


बेंगलूर। सड़कों पर वाहनों के जमघट से उपजने वाली समस्या को इसकी जड़ में ही खत्म करने की कोशिशें अब तेजी पकड़ने वाली हैं। 9 अप्रैल को शहर के व्यस्ततम बस-अड्डों में से एक मैजेस्टिक बस स्टैंड के चेहरे में सुधार लाने का काम शुरू होगा। इस बस स्टैंड से अपनी यात्रा शुरू करने वाली सवारियों को यहां की व्यवस्थाओं से कई तरह की शिकायतें रहती आई हैं। इनमें मुख्य शिकायत यह रही है कि इस बस स्टैंड में उपलब्ध पूरे स्थान का समुचित प्रयोग न किए जाने से इसकी पूरी क्षमता के अनुसार यात्रियों को बसों की सेवा नहीं मिल पाती है। कुछ वर्ष पूर्व यह शिकायत दूर करने के लिए मैजेस्टिक को 45 मंजिले बस स्टैंड का स्वरूप देने का प्रस्ताव रखा गया था। जानकारी के मुताबिक, इस प्रस्ताव पर विचार-विमर्श करने के बाद अब इसे जमीनी स्तर पर लागू करने की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं।
मैजेस्टिक बस स्टैंड को नया चेहरा देने की कोशिशों के तहत बस यात्रियों को कई प्रकार की यातायात सुविधाएं एकीकृत स्वरूप में उपलब्ध करवाने पर ध्यान केन्द्रित किया जाएगा। इस बस स्टैंड से यात्री बेंगलूर महानगर परिवहन निगम (बीएमटीसी) की बसों के साथ ही कर्नाटक राज्य परिवहन निगम (केएसआरटीसी) बसों की सेवा भी प्राप्त कर सकेंगे। इनके साथ ही मैजेस्टिक बस स्टैंड के भूतल से 60 फीट नीचे बेंगलूर मेट्रो रेल और मोनोरेल स्टेशन भी बनेंगे। यानी एक ही स्थान पर लोगों को शहरी और अन्तरशहरीय यातायात के सभी विकल्प उपलब्ध करवाने की योजना है। इन सबके साथ ही, सभी प्रस्तावित 45 मंजिलों का निर्माण कार्य पूरा हो जाने पर निजी वाहनों की पार्किंग के लिए भी पर्याप्त स्थान उपलब्ध हो जाएगा। योजना के मुताबिक, यात्रियों को छह मंजिलों पर केएसआरटीसी और छह मंजिलों पर बीएमटीसी की बस सेवाओं के साथ ही छह मंजिलों पर मेट्रो रेल की सेवाएं भी मिलेंगी। वहीं 18 मीटर का एक गलियारा ऐसा होगा जिसमें मेट्रो रेल और मोनो रेल का प्रयोग करने वाले यात्री सुविधानुसार मोनो या मेट्रो रेल की सेवाएं ले सकेंगे।
इस नई यातायात योजना के तहत बेंगलूर शहर के अन्दर ही कुछ नए बस-स्टॉप भी बनाए जाएंगे। यह सभी बस स्टॉप मैजेस्टिक बस स्टैंड के आस-पास होंगे। इनमें बेंगलूर सिटी रेलवे स्टेशन रोड, सिल्क हाउस रोड, शान्ताला रोड बस स्टॉप शामिल होंगे। इन नए बस स्टॉप पर बीएमटीसी की बसें रुकेंगी जबकि केएसआरटीसी की बसों के लिए दस नए बस स्टॉप बनेंगे।
मैजेस्टिक बस स्टैंड को शानदार नया चेहरा देने की इस महत्त्वाकांक्षी परियोजना पर अनुमानित 500 करोड़ रुपए की लागत आने की जानकारी मिली है। उम्मीद जताई जा रही है कि इस परियोजना का काम पूरा होने पर मैजेस्टिक बस स्टैंड शहर में सड़क एवं वैकल्पिक रेल यातायात व्यवस्था का मुख्य केन्द्र बन जाएगा। इस विशालकाय बस स्टैंड के वाणिज्यिक प्रयोग की योजना भी तैयार कर ली गई है। कुल मिलकर "मैजेस्टिक' अपने नाम के अनुरूप जल्दी ही एक शानदार चेहरे के साथ दैनिक यात्रियों की सेवा करने को तैयार हो जाएगा ताकि यात्रियों को सफर की शुरुआत से ही बेहतरीन सेवा दी जा सके।

मनोरंजन तथा विलासिता करों में कटौती लागू

* सिनेमाघरों के टिकट होंगे सस्ते तथा होटल-रेस्तरांओं की सेवाएं होंगी सस्ती
* मनोरंजन कर में 10 फीसदी तथा विलासिता कर में दो फीसदी की कटौती
* होटलों ने मंदी के मौसम में ग्राहकों को लुभाने की नई योजना तैयार की



बेंगलूर। वित्त वर्ष 2009-10 के लिए मुख्यमंत्री बीएस येड्डीयुरप्पा द्वारा घोषित बजट प्रस्तावों में मनोरंजन कर में कटौती का प्रावधान किया गया था। यह प्रावधान 1 अप्रैल, बुधवार से लागू हो गया है। पर्यटन एवं आतिथ्य क्षेत्रों से जुड़े होटलों तथा रेस्तरांओं को भी राज्य सरकार की तरफ से कुछ कर राहत दी गई है। आर्थिक मंदी के इस दौर में कोई सरकार इससे बेहतर तोहफा और क्या दे सकती थी? राज्य में मनोरंजन कर जहां पूर्व में 40 फीसदी की दर से वसूला जाता था वहीं अब यह 30 फीसदी की दर से वसूला जाएगा। यहां के सिनेमाघरों में आने वाले सिने-प्रेमियों की संख्या वैश्विक मंदी के कारण हाल के समय में काफी घट रही थी जिसके कारण सिनेमाघरों ने अपने टिकटों के मूल्य में पहले ही कटौती कर दी है। मनोरंजन कर की दरों में कटौती के कारण टिकटों का मूल्य आगे भी कम किए जाने की संभावना बनी है।
इसी तरह की छूट होटलों के कमरों की बुकिंग पर लिए जाने वाले विलासिता कर (लक्जरी टैक्स) के मामले में भी दी गई है। जहां पहले होटलों को 500 से 1000 रुपए किराए वाले कमरों की बुकिंग पर 6 फीसदी की दर से कर देना पड़ता था, वहीं अब इन कमरों की बुकिंग पर उन्हें मात्र 4 फीसदी की दर से कर देना होगा। 1000 रुपए से 2000 रुपए तथा 2000 रुपए से अधिक किराए वाले कमरों की बुकिंग पर भी क्रमश: 6 एवं 10 प्रतिशत की दर से कर वसूला जाएगा। उल्लेखनीय है कि पूर्व में 1000 रुपए से 2000 रुपए तथा 2000 रुपए से अधिक किराए वाले कमरों की बुकिंग पर होटलों से क्रमश: 8 एवं 12 फीसदी की दर से विलासिता कर वसूला जाता था।
शहर के होटलों तथा रेस्तरांओं ने इस कर कटौती का फायदा अपने ग्राहकों तक पहुंचाने के साथ ही उनके लिए मनोरंजन के खास प्रबंध करने की योजना भी बना ली है। इनमें आईपीएल ट्‌वेंटी-20 मैचों का सीधा प्रसारण मुख्य रूप से शामिल है। यहां के कई होटलों ने अपनी सेवाओं के मूल्य संवर्द्धन के लिए आईपीएल मैचों के दौरान नई रैक रेट (घोषित मूल्य) भी तय कर ली है। इनके ग्राहकों को इन होटलों में शीर्ष गुणवत्तापूर्ण सेवाएं पहले की अपेक्षा बेहतर तथा प्रतियोगी कीमतों पर मिलेंगी। इनके साथ कई क्लबों के नाम भी जुड़ गए हैं जो आईपीएल मैचों का अपने सदस्यों के लिए सीधा प्रसारण दिखाएंगे ताकि उनके सदस्य खेल का मजा मिल-जुलकर ले सकें।
जानकारी के मुताबिक, वैश्विक मंदी के बावजूद बेंगलूर के मनोरंजन तथा आतिथ्य व्यापार जगत में जो उत्साह पनपा है उसे अब कोई गुब्बारा नहीं माना जा सकता है। राज्य सरकार ने अपने बजटीय वादे पर खरे उतरते हुए इन कर कटौतियों के प्रस्तावों को एक शासकीय अधिसूचना जारी कर निर्धारित तिथि से ही जारी कर दिया है। स्टांप तथा पंजीयन विभाग ने भी अपनी तरफ से स्टांप शुल्क में कटौती कर व्यापार जगत का उत्साह बढ़ाया है।